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क्या आपने उत्तराखंड के नैन सिंह रावत का नाम सुना है । Have you heard of Nain Singh Rawat from Uttarakhand?

कोलंबस और वास्को-डी-गामा को तो आप जानते ही होंगे, पर क्या आपने उत्तराखंड के नैन सिंह रावत का नाम सुना है 🤔
19वीं सदी में, जब न GPS था, न सैटेलाइट और न ही कोई आधुनिक उपकरण — तब पंडित नैन सिंह रावत ने पूरे तिब्बत का नक्शा तैयार कर दिया। और वो भी बिल्कुल गुप्त तरीके से।

उत्तराखंड के सीमावर्ती गांव भटकुरा से निकलने वाले नैन सिंह रावत कभी पढ़े-लिखे अफसर नहीं थे। शुरुआत में वो एक साधारण कुली थे। लेकिन हिम्मत, दिमाग और मेहनत ने उन्हें दुनिया के सबसे महान सर्वेकारों में खड़ा कर दिया। उनके पास न तो मापने की मशीन थी, न कंपास। तो उन्होंने अपना ही तरीका बना लिया। उनके हाथ में हमेशा एक माला रहती थी। सामान्य माला में 108 मनके होते हैं, लेकिन उनकी माला में थे 100 मनके। हर 100 कदम चलने पर वो एक मनका खिसका देते थे। इस तरह 100 मनकों में हो जाते थे 10,000 कदम — यानी पूरे 5 मील। कदम बराबर रहें, इसके लिए उन्होंने अपने पैरों के बीच एक रस्सी बांध ली, ताकि हर कदम ठीक 31.5 इंच का हो।

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सोचिए…
बर्फीले पठार, ऊँचे दर्रे, खतरनाक रास्ते —
और हर कदम का हिसाब!
ऐसा करते-करते पंडित नैन सिंह ने 31 लाख 60 हजार कदम गिने।
उन्होंने अपने जीवन में 6 बड़ी यात्राएं कीं,
जिनकी कुल लंबाई थी करीब 42,000 किलोमीटर।

✔️ लद्दाख से ल्हासा का नक्शा बनाया
✔️ ल्हासा की ऊंचाई पहली बार नापी
✔️ तारों से ल्हासा का अक्षांश-देशांतर निकाला
✔️ यह साबित किया कि सांगपो नदी ही ब्रह्मपुत्र है
✔️ सतलज और सिंधु के उद्गम खोजे

उनके इस अद्भुत काम के लिए अंग्रेजी सरकार ने उन्हें ‘पेट्रोन गोल्ड मेडल’ दिया — सर्वेक्षण के क्षेत्र का सबसे बड़ा सम्मान। और ये सम्मान पाने वाले वो इकलौते भारतीय हैं। 16 साल तक घर नहीं लौटे, तो लोग उन्हें मृत मान बैठे। लेकिन उनकी पत्नी को पूरा भरोसा था। वो हर साल उनके लिए ऊन कातकर एक कोट और पैजामा बनाती रहीं। जब 16 साल बाद नैन सिंह लौटे, तो पत्नी ने उन्हें एक साथ 16 कोट-पैजामे दिए। ये सिर्फ इतिहास नहीं है। ये कहानी है गढ़वाल की मिट्टी, हौसले और भरोसे की। देवभूमि उत्तराखंड को अपने इस सपूत पर गर्व है।

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