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बीते एक पखवाडे से चल रही मां नंदा की वार्षिक लोकजात यात्रा का आज समापन हो गया।

नंदा की वार्षिक लोकजात !– जा मेरी गौरा तू, चौखम्भा उकाली..
कैलाश विदाई के साथ ही नंदा के लोकोत्सव का समापन..

आखिरकार बीते एक पखवाडे से चल रही मां नंदा की वार्षिक लोकजात यात्रा का आज समापन हो गया। उच्च हिमालयी बुग्याल में श्रद्धालुओं नें पौराणिक लोकगीतों और जागर गाकर हिमालय की अधिष्टात्री देवी माँ नंदा को कैलाश के लिये विदा किया। मेरी मैत की धियाणी तेरू बाटू हेरदू रोली, जा मेरी गौरा जा तू शिव का कैलाश, जा मेरी गौरा तू, चौखम्भा उकाली.. जैसे गीतों के साथ अपनी ध्याण को विदा करते समय महिलाओं की आंखे अश्रुओं से छलछला गयी। खासतौर पर ध्याणियां मां नंदा की डोली को कैलाश विदा करते समय फफककर रो पड़ी। इस दौरान श्रद्धालुओं नें अपने साथ लाये खाजा- चूडा, बिंदी, चूडी, ककड़ी, मुंगरी भी समौण के रूप में माँ नंदा को अर्पित किये। अपने अंतिम पडाव से शनिवार सुबह नंदा सप्तमी के दिन नंदा ,राजराजेश्वरी की डोली हिमालयी उच्च बुग्याल बेदनी, बंड की नंदा डोली नरेला बुग्याल, कुरूड दशोली की नंदा डोली बालपाटा पहुंची और यहां पर पूजा अर्चना कर, तर्पण करके मां नंदा को कैलाश के लिए विदा किया।

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उच्च हिमालय में स्थित नरेला बुग्याल में सम्पन्न हुई बंड नंदा की लोकजात!

सूर्य भगवान की किरणों और बादलों की लुकाछुपी के बीच सुनहरे मौसम में मंगलवार को बंड की नंदा की डोली पंचगंगा से चलकर नरेला बुग्याल पहुंची। जहां पर पहुंचे श्रद्धालुओं नें मां नंदा की पूजा अर्चना कर उन्हें समौण भेंट की और माँ नंदा को जागरों के माध्यम से कैलाश की ओर विदा किया गया। इस दौरान पूरा हिमालय मां नंदा के जयकारे से गुंजयमान हो गया।

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